BBC HINDI : कोवैक्सीन, देसी होने के बाद भी इतनी महँगी क्यों?

सरोज सिंह, बीबीसी संवाददाता, साल 2020, अगस्त का पहला हफ़्ता. एक पब्लिक इवेंट में मौजूद भारत बायोटेक के चेयरमैन डॉ. कृष्णा एला से सवाल पूछा गया, ‘कंपनी जो कोवैक्सीन बना रही है उसकी क़ीमत क्या आम लोगों के पहुँच में होगी?’

इस सवाल के जवाब में भारत बायोटेक के चेयरमैन डॉ. कृष्णा एला ने कहा था, “एक पानी की बोतल के दाम से कम होगा टीके का दाम.”

10 महीने बाद उनका ये बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है.




सोशल मीडिया पर लोग सवाल कर रहे हैं कि 10 महीने में ऐसा क्या हुआ कि प्राइवेट अस्पतालों में लगने वाली कोवैक्सीन अब भारत में बिकने वाली कोरोना की सबसे महँगी वैक्सीन हो गई है.

8 जून को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ़ से जारी आदेश में कोवैक्सीन की क़ीमत 1200 तय की गई है. इस पर जीएसटी 60 रुपये और सर्विस चार्ज 150 रुपये लगाने के बाद प्राइवेट अस्पताल में आपको ये वैक्सीन 1410 रुपये की मिलेगी. वहीं कोविशील्ड की क़ीमत 780 रुपये और स्पुतनिक-V की क़ीमत 1145 रुपये होगी.


इस सरकारी आदेश के बाद सोशल मीडिया पर कई लोग अब ये सवाल पूछ रहे हैं कि स्वदेशी होने के बाद भी कोवैक्सीन इतनी महँगी क्यों है?

कोवैक्सीन




टीका बनाने में ख़र्च कहां-कहां आता है?
इसके लिए ये जानना ज़रूरी है कि टीका बनाने की प्रक्रिया क्या है और मोटा ख़र्च कहां-कहां होता है. यही समझने के लिए हमने बात की IISER भोपाल में प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. अमजद हुसैन से.

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डॉ. अमजद हुसैन ने भोपाल से फ़ोन पर बीबीसी को बताया, “वैक्सीन किस तरीके से बनी है उस पर निर्भर करता है कि उसे बनाने में किस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. जिस तकनीक से कोवैक्सीन बनाई जा रही है, उसमें इनएक्टिवेटेड वायरस बेस का इस्तेमाल किया जा रहा है. ये दूसरे तरीकों के मुक़ाबले थोड़ा ज़्यादा ख़र्चीला है.”




“इसमें वायरस को सेल के अंदर पहले कल्चर किया जाता है. उसके बाद इनएक्टिव किया जाता है.”

“वायरस के कल्चर की जो प्रक्रिया है उसमें ज़्यादा समय लगता है. इसके अलावा वैक्सीन बनने से पहले कई स्तर पर इसके ट्रायल्स होते हैं. पहले प्री-क्लीनिकल स्टडी, जिसमें सेल्स में परीक्षण और टेस्ट किए जाते हैं. उसके बाद क्लीनिकल ट्रायल के तीन चरण होते हैं. इस प्रक्रिया में भी काफ़ी ख़र्च आता है.”

“हर देश में इसके कुछ नियम समान होते हैं, लेकिन कुछ नियम अलग भी होते हैं. इन ट्रायल्स के नतीजों के आधार पर देश की नियामक संस्थाएं वैक्सीन के इस्तेमाल के लिए इजाज़त देती हैं. फिर बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होता है. इस पर भी काफ़ी ख़र्च आता है. प्रक्रिया के इस चरण में क्वालिटी मॉनिटरिंग बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसके बाद ही वैक्सीन को वैक्सीनेशन सेंटर पर भेजा जाता है.”

“इसका मतलब ये हुआ कि वैक्सीन की क़ीमत केवल तकनीक पर ही नहीं निर्भर करती बल्कि उसके ट्रायल, उत्पादन, रख-रखाव, क्वालिटी कंट्रोल पर भी निर्भर करती है.”




कोवैक्सीन की क़ीमत अधिक क्यों है ये जानने के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि भारत बायोटेक ने कोवैक्सीन बनाने में किस मद में कितना ख़र्च किया है.

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सबसे पहले बात तकनीक की. कोवैक्सीन इनएक्टिवेटेड वायरस वैक्सीन है, जो मृत वायरस के इस्तेमाल से बनाई गई है.

इस वजह से बड़े पैमाने पर कोवैक्सीन बनाने की रफ़्तार उतनी तेज़ नहीं हो सकती, जितनी वेक्टर बेस्ड वैक्सीन बनाने की हो सकती है. अगर किसी सीमित अवधि में 100 वेक्टर बेस्ड वैक्सीन बन सकते हैं तो उतने ही समय में एक इनएक्टिवेटेड वायरस वैक्सीन बन सकती है.

इस तरह की वैक्सीन बनाने के लिए, मृत वायरस को कल्चर करने की ज़रूरत होती है, जो ख़ास तरह के बॉयो सेफ़्टी लेवल-3 (BSL3) लैब में ही संभव हो सकता है.




ट्रायल के शुरुआती दिनों के दौरान भारत बायोटेक के पास केवल एक BSL3 लैब था. लेकिन अब धीरे-धीरे उसने ये संख्या बढ़ाकर चार की है, जिनमें ये काम चल रहा है. इस पर कंपनी ने काफी ख़र्च किया है.