स्कूलों की फीस पर सुप्रीम फैसला, अदालत का ओदश जब चले नहीं स्कूल तो कम करें फीस

सोमवार 3 मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि ‘देश में कोरोना महामारी के चलते सभी शैक्षणिक संस्थान बंद हैं। तब ऐसे में छात्र उन सभी मिलने वाली जरूरतों का लाभ नहीं ले सके जो उन्हें एक स्कूल में जाकर मिलती हैं, इसलिए सभी शैक्षणिक संस्थान अपनी फीस कम करें। संस्थान विद्यार्थियों से सत्र 2020-21 की वार्षिक फीस ले सकते हैं, किंतु उन्हें इसमें 15 फीसदी की कटौती करनी पड़ेगी।’ सुप्रीम कोर्ट द्वारा सोमवार 3 मई को दिया गया यह फैसला लाखों-करोड़ों अभिवावकों के लिए राहत की खबर है।




सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस एएम खानविल्कर और दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने शैक्षणिक संस्थानों को छह किश्तों में 5 अगस्त 2021 तक फीस लेने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर कोई विद्यार्थी समय पर फीस जमा कर पाने में असमर्थ है, तो उन परिस्थितियों में कक्षा दसवीं और बारहवीं के छात्रों का परिणाम रोका नहीं जा सकता। विद्यालय ऐसे छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोक नहीं सकते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पीछे जो मामला था, उसमें राजस्थान सरकार ने हाल ही में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 की धारा 72 के तहत राज्य के 36,000 सहायता प्राप्त निजी और 220 सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक विद्यालयों को वार्षिक फीस में 30 फीसदी कटौती करने का निर्देश दिया था, लेकिन इसे संविधान के अनुच्छेद 19.1.G के तहत विद्यालयों को व्यवसाय करने के लिए दिए गए मौलिक अधिकार का विरूद्ध मानते हुए विद्यालयों ने सरकार के इस आदेश को कोर्ट में चुनौती दी थी।




न्यायमूर्ति खानविलकर ने कहा ‘अपीलकर्ता’ विद्यालय शैक्षणिक सत्र 2019-20 के लिए 2016 के कानून के तहत निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप शुल्क वसूल कर सकते हैं, लेकिन शैक्षणिक संस्थान सत्र 2020-21 के लिए विद्यार्थियों द्वारा इस्तेमाल न की गईं, सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए 15 प्रतिशत कम फीस वसूल करें।’

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