मुस्लिम, मतुआ, महिला और ममता- बंगाल चुनाव में टीएमसी के शानदार प्रदर्शन के ये हैं अहम फैक्टर

नई दिल्‍ली/कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Election Result 2021) के शुरुआती रुझानों में फाइव एम फैक्टर (Five M Fectors) बढ़-चढ़कर अपना रंग दिखा रहा है. बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस (BJP and Trinamool Congress) की नजर इन पांच एम पर थीं. बीजेपी जहां मोदी और मतुआ (Modi and Matua) के सहारे फतह की तैयारी कर रही थी तो वहीं टीएमसी (TMC) ममता, महिला और मुस्लिम (Mamta, Mahila and Muslim) के सहारे सत्ता में तीसरी बार वापसी की तैयारी कर रही थीं.




एम फैक्टर का ही प्रभाव है कि कि आज तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी तीसरी बार सत्ता में वापसी करती दिख रही हैं. कांग्रेस, लेफ्ट और आईएसएफ के गठबंधन के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं ने ममता का साथ दिया है. वहीं, दूसरी तरफ एम फैक्टर का ही नतीजा है कि पांच साल पहले तक जिस बीजेपी की 3 सीट थी, वह इस चुनाव में 100 सीट के आस-पास पहुंचती दिख रही है. इस चुनाव के शुरुआती परिणाम बता रहे हैं कि चार एम यानी ममता, मुस्लिम, मतुआ और महिला टीएमसी के साथ खड़ी नजर आ रही हैं, वहीं बीजेपी को सिर्फ एक एम यानी मोदी का ही प्रभाव काम आया.
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फाइव एम में फोर M टीएमसी के साथ
बता दें कि पश्चिम बंगाल में मतुआ जाति के तकरीबन 30 लाख लोग रहते हैं. बांग्लादेश सीमा से सटे नादिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना की चार लोकसभा सीटों और तकरीबन 30 से 40 विधानसभा सीटों के नतीजों को इस समुदाया के लोग प्रभावित करते हैं. इन सीटों पर छठे चरण में यानी 22 अप्रैल को मतदान हुआ था. मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल की अनुसूचित जाति की आबादी का बड़ा हिस्सा है. यह समुदाय साल 1950 से ही पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में पलायन कर रहा था. ऐसा माना जा रहा है कि इसकी बड़ी वजह धार्मिक आधार पर उत्पीड़न रहा है. इस चुनाव में बीजेपी ने भरोसा दिया था कि अगर बीजेपी सत्ता में वापसी करती है तो इन समुदाय को सीएए और एनआरसी से अलग रखा जाएगा, लेकिन शुरुआती रुझान और नतीजों से लग रहा है कि पं बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी का दांव कारगर नहीं साबित हुआ. इस समुदाय के लोगों ने टीएमसी के पक्ष में बढ़-चढ़ कर वोट दिया है.




मुस्लिम मतदाताओं ने लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन को दिया झटका
अगर मुस्लिम वोटरों की बात करें तो इस बार भी मुस्लिम वोटरों की चाबी ममता बनर्जी के हाथ में ही रही. बंगाल में बीते एक दशक से मुस्लिम मतदाता ममता के साथ रहे हैं. इस बार मुस्लिम वोटोरों को लुभाने के लिए लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस ने आईएसएफ जैसे कट्टरपंथी दल के साथ गठजोड़ तो किया था, लेकिन चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि इस गठबंधन को मुस्लिम वोटरों ने सिरे से खारिज कर दिया. ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भी इस चुनाव में करारा जवाब मिला है.

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मुस्लिम मतदाताओं ने दिया ममता का साथ
पश्चिम बंगाल के कुल 294 विधानसभा क्षेत्रों में 46 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम 50 प्रतिशत से ज्यादा हैं. वहीं 16 से 20 सीटें ऐसी हैं जहां पर मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी से अधिक है. 30 से 35 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है और 50 सीटों पर मुस्लिम 25 फीसदी से अधिक हैं. यानि तकरीबन 120 से 140 सीटें ऐसे हीं जहां पर मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस चुनाव में 100 से 120 सीटों पर टीएमसी ने मजबूत बढ़त बना रखी है.




बंगाल में बीजेपी एक दिन पहले तक 200 सीटों का आंकड़ा पार करने का दावा कर रही थी.

बीजेपी के दावे की निकली हवा
हालांकि, बंगाल में बीजेपी एक दिन पहले तक 200 सीटों का आंकड़ा पार करने का दावा कर रही थी. खासकर चुनाव से ठीक पहले बीजेपी की नजर ओबीसी वोट पर थी. इसी को ध्यान में रख कर बीजेपी ने टिकट बंटवारे के साथ-साथ चुनाव प्रचार की रणनीति भी बनाई थी. खासकर मतुआ जाति को साधने के लिए बीजेपी ने बड़ा दांव खेला था. बीजेपी ने मतुआ समुदाय के लोगों को भी बढ़-चढ़ कर टिकट भी दिया था. खुद पीएम मोदी इसी दौरान बांग्लादेश की यात्रा भी की थी और इस समुदाय के मंदिर में जा कर पूजा अर्चना कर वोट को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन रुझानों में पीएम मोदी के यह दांव कारगर होता नहीं दिख रहा है. मतुआ बहुल तकरीबन 30 सीटों पर टीएमसी उम्मीदवारों ने बढ़त बना रखा है.

मतुआ ने क्यों नहीं दिया बीजेपी का साथ
बीजेपी सांसद और मतुआ ठाकुरबाड़ी गुट के नेता सांतनु ठाकुर के उस दावे की भी हवा निकल गई है, जिसमें वे कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस और माकपा सरकार ने मतुआ के लिए कुछ नहीं किया है. कुलमिलाकर पं बंगाल चुनाव के शुरुआती परिणाम और रुझानों में मतुआ समुदाय ने टीएमसी पर ही विश्वास जताया है.”,