HYPERSONIC WARFARE: इजरायल की जंग ने एयर डिफेंस की जरूरत को पूरी दुनिया को समझा दिया है. हमास-हिजबुल्लाह और ईरान के हमलों से इजरायल को आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम ने ही बचाया था. जब तक रॉकेट और सामान्य मिसाइलों से हमले हो रहे थे, तब तक एक भी हमला इजरायल की जमीन पर नहीं हुआ. लेकिन जैसे ही इन हमलों में हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलों से अटैक की संख्या बढ़ी, इजरायली आयरन डोम, ऐरो और अन्य सिस्टम को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. पिछले साल अक्टूबर में पहली बार ईरान ने 200 के करीब बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें दागी थीं. अब सवाल यह उठता है कि हाइपरसोनिक मिसाइल अटैक का कोई तोड़ किसी देश के पास है या नहीं. डीआरडीओ के साइंटिस्ट और पूर्व प्रवक्ता रवी गुप्ता (रि) का कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइल को तो डिटेक्ट कर सकते हैं और उसे इंटरसेप्ट भी किया जा सकता है क्योंकि लॉन्च होने के काफी समय तक यह हवा में रहती है. लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइल, जो एटमस्फेयर में अपनी सबसे कम स्पीड 5 मैक से उड़ान भरती है, उसे ट्रैक करना और फिर उसके खिलाफ एयर डिफेंस मिसाइल लॉन्च करना बहुत मुश्किल है.
हाइपरसोनिक मिसाइल का मार से बचना मुश्किल
ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइलों ने इजरायल में कई जगह भारी तबाही मचाई. हाइपरसोनिक मिसाइल आज के दौर में सबसे घातक हथियार है. घातक इसलिए क्योंकि इसे डिटेक्ट कर पाना और फिर उसे एंगेज करना काफी मुश्किल है. सबसे कम रफ्तार की हाइपरसोनिक मिसाइल 5 मैक की होती है, जिसे अगर किलोमीटर में समझने की कोशिश करें तो यह लगभग 6173 किलोमीटर दूरी एक घंटे में तय कर सकती है. इजरायल और ईरान का एरियल डिस्टेंस 2000 किलोमीटर के करीब है. यह आवाज की गति से 5 गुना तेज ट्रैवल करती है और अधिकतम रफ्तार 10 मैक तक हो सकती है. डीआरडीओ के पूर्व प्रवक्ता रवी गुप्ता (रि) के मुताबिक, हाइपरसोनिक मिसाइल को इंटरसेप्ट करने के लिए या तो हाइपरसोनिक एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है या फिर उससे तेज हाइ-हाइपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल की, जिसकी रफ्तार 10 से 25 मैक के करीब होती है.फिलहाल दुनिया के किसी भी देश के पास ऐसा इंटरसेप्टर मौजूद नहीं है. सिंगल सुपरसोनिक स्पीड वाली इंटरसेप्टर मिसाइल से एंगेज करना नामुमकिन है. एक साथ कई सुपरसोनिक मिसाइल अगर दागी जाएं तो संभावना है कि एक-दो उसमें लग जाएं, वर्ना काफी मुश्किल है.
बैलिस्टिक मिसाइल को किया जा सकता है एंगेज
बैलिस्टिक मिसाइल अलग-अलग रेंज के होते हैं. सबका सिद्धांत एक ही है. लॉन्च होने के बाद यह एग्जोएटमस्फेयर यानी स्पेस तक पहुंचती है और फिर फिजिक्स के पैराबोलिक सिद्धांत के हिसाब से वायुमंडल में प्रवेश करती है और अपने टार्गेट पर बरस जाती है. स्पेस से जब यह नीचे आती है तो इसकी रफ्तार 25 मैक यानी हाई हाइपरसोनिक रफ्तार होती है. अब सवाल यह है कि फिर इसे कैसे एंगेज किया जा सकता है. इसका जवाब है हां में है. लंबे समय तक यह हवा में ट्रैवल करती है और किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल के लॉन्च का पता रडार कर लेता है. लिहाजा इसका कैल्क्यूलेशन किया जा सकता है कि मिसाइल कहां गिरेगी. इसी समय लॉन्च की जाती हैं एंटी बैलिस्टिक मिसाइलें. रवी गुप्ता के मुताबिक, जब बैलिस्टिक मिसाइल नीचे आती है तो वह एक पत्थर की तरह ग्रैविटी के प्रभाव से गिरती है. इस वक्त उसका कोई रॉकेट मोटर इंजन उसे मैनूवर करने के लिए एक्शन में नहीं होता. उसे स्पूफ करना भी असंभव होता है. लेकिन एंटी बैलिस्टिक मिसाइल से इसे एंगेज किया जा सकता है.