पिछले 80 सालों में 10 देशों ने कैसे हासिल किए परमाणु हथियार, क्या अब कोई देश परमाणु बम नहीं बना सकता, अगर ईरान ने बना लिया तो क्या हो जाएगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में...
सवाल-1: दुनिया में पहला परमाणु बम कैसे बना?
जवाबः दिसंबर 1938। जर्मनी की एक लैब में वैज्ञानिक ओट्टो हान और फ्रिट्ज स्ट्रॉसमैन ने यूरेनियम-235 के परमाणु पर न्यूट्रॉन की तेज बौछार की। इससे यूरेनियम का परमाणु अचानक दो हिस्सों में टूट गया और उससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकली।
इस प्रयोग को नाभिकीय विखंडन कहा गया। यहूदी साइंटिस्ट लीजा माइटनर ने कहा कि इसकी चेन रिएक्शन कराएं तो भयंकर एनर्जी रिलीज होगी। अमेरिकी वैज्ञानिकों को लगा कि नाजी जर्मनी के हाथों में एक बड़ा हथियार आ गया है।
अमेरिका ने भी जून 1942 में मैनहैटन में एक ऊंची इमारत की 18वीं मंजिल पर गोपनीय तरीके से एटम बम बनाने की तैयारी शुरू कर दी। अमेरिकी ब्रिगेडियर जनरल लेस्ली ग्रोव्स और साइंटिस्ट जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर की अगुआई में ‘मैनहैटन प्रोजेक्ट’ शुरू हुआ।
इसके लिए दो महीने के अंदर 100 टन यूरेनियम जुटाया गया। बम की डिजाइन पर काम करने के लिए ओपेनहाइमर ने न्यू मेक्सिको के लॉस एलामोस के बीहड़ में लैबोरेटरी बनाई। बम बनाने के लिए यूरेनियम-235 को 90% तक संवर्धित यानी प्योर करने का काम टेनेसी के ओक रिज में हुआ। वहीं वॉशिंगटन के हैनफोर्ड में प्लूटोनियम-239 का उत्पादन हुआ।
दो साल बाद जुलाई 1945 में यूरेनियम और प्लूटोनियम के दो बम बनकर तैयार हो चुके थे। 16 जुलाई 1945 को ट्रिनिटी में अमेरिका ने पहले बम का सफल परीक्षण किया।

ट्रिनिटी में धमाके से ठीक पहले बम की तस्वीर
रूजवेल्ट की अचानक मौत के बाद हैरी ट्रूमैन अमेरिकी प्रेसिडेंट बने थे। उनके ग्रीन सिग्नल के बाद 6 अगस्त को जापान के हिरोशिमा पर यूरेनियम बम ‘लिटिल बॉय’ और 9 अगस्त को नागासाकी पर प्लूटोनियम बम ‘फैटमैन’ दागा गया। दोनों धमाकों में करीब डेढ़ लाख लोग तुरंत मारे गए।
1952 में अमेरिका ने न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक विकसित करके हाइड्रोजन बम भी बना लिया। ये नागासाकी पर गिरे बम से 450 गुना ज्यादा ताकतवर था।
सवाल-2: अमेरिका की तकनीक से और किन देशों ने परमाणु बम बनाए?
जवाबः 1941 में जब अचानक न्यूक्लियर फिजन पर इन वैज्ञानिकों की रिसर्च छपनी बंद हुईं, तो सोवियत संघ के कान खड़े हुए। उसने भी अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम शुरू कर दिया। रूस के जासूस भी अमेरिका में एक्टिव थे।
मैनहैटन प्रोजेक्ट के 12 वैज्ञानिकों में एक 20 साल का लड़का थियोडोर हॉल भी था। उसके रूसी मूल के दोस्त सैविले साक्स ने मैनहैटन प्रोजेक्ट की डिटेल्स निकलवाकर रूस को भेज दीं।
29 अगस्त 1949 को रूस ने RDS-1 नाम से बम की सफल टेस्टिंग कर ली। 1955 में सोवियत ने RDS37 टेस्ट के तहत हाइड्रोजन बम भी बना लिया।
मैनहैटन प्रोजेक्ट में अमेरिका के अलावा कनाडा और UK के वैज्ञानिक शामिल थे। अमेरिका बम बनाने के बाद UK को फाइनल रिसर्च देने से मुकर गया। UK ने अपने दम पर काम चालू रखा और 1952 में 25 किलोटन के प्लूटोनियम बम की सफल टेस्टिंग कर ली। इसके बाद 1957 में ब्रिटेन ने हाइड्रोजन बम भी बना लिया।
फ्रांस के भी कुछ वैज्ञानिक मैनहैटन प्रोजेक्ट में शामिल थे। इन वैज्ञानिकों ने इजराइल के साथ मिलकर न्यूक्लियर तकनीक पर काम किया। 13 फरवरी 1960 को फ्रांस ने एटम बम की सफल टेस्टिंग कर ली और 24 अगस्त 1968 को हाइड्रोजन बम भी बना लिया।

‘बिग थ्री’ कहे जाने वाले (बाएं से दाएं) ब्रिटिश PM चर्चिल, अमेरिकी प्रेसिडेंट रूजवेल्ट और रूसी PM स्टालिन। 1945 में एक मुलाकात में रूजवेल्ट ने स्टालिन से कहा कि मेरे पास कुछ ऐसा है जो युद्ध रोक सकता है, इस पर स्टालिन मुस्करा दिए, क्योंकि वो भी परमाणु बम बनाना शुरू कर चुके थे।
सवाल-3: चीन, इजराइल और भारत ने कैसे बनाए परमाणु बम?
जवाबः चीन ने 1957 में सोवियत रूस की मदद से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर काम शुरू किया था। चीन के पास अपना यूरेनियम का भंडार था। 1960 में उसे सोवियत से तकनीकी मदद मिलनी बंद हो गई तो उसने कियान सानकियांग जैसे अपने साइंटिस्ट्स की अगुआई में यूरेनियम का संवर्धन किया और 16 अक्टूबर 1964 को एटम बम की सफल टेस्टिंग की। 17 जून 1967 को चीन ने हाइड्रोजन बम भी बना लिया।
न्यूक्लियर वेपन बनाने वाला छठा देश बना इजराइल। 1950 के दशक में इजराइल ने फ्रांस की मदद से प्लूटोनियम संवर्धन के लिए न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर शुरू किया।
1963 में अमेरिकी प्रेसिडेंट जॉन एफ केनेडी के दबाव में इजराइल ने नेगेव के रेगिस्तान में बने इस कथित रिसर्च सेंटर का इंस्पेक्शन करवाया, लेकिन वो अंडरग्राउंड फैसिलिटी छिपा ली, जहां बम बनाने का काम चल रहा था। 1967 तक उसने भी परमाणु बम बना लिया।
हालांकि, इजराइल ने खुद कभी भी ये नहीं माना कि उसके पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन 1986 में इजराइल के वैज्ञानिक मोर्दखाई वानुनु ने ब्रिटिश अखबार ‘द संडे टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में तस्वीरें और डॉक्यूमेंट्स दिखाकर खुलासा कर दिया कि इजराइल के पास 100 से 200 परमाणु बम हैं। वानुनु 1976 से 1985 तक नेगेव रिसर्च सेंटर में बतौर टेक्नीशियन काम करते थे।
भारत का परमाणु प्रोग्राम होमी जहांगीर भाभा की अगुआई में शुरू हुआ था। 1956 में भारत को कनाडा से मिले CIRUS रिएक्टर में प्लूटोनियम का उत्पादन शुरू हुआ। भारत का न्यूक्लियर प्रोग्राम ऊर्जा के उद्देश्यों के लिए था, लेकिन 1962 में चीन से जंग हारने के बाद भारत ने एटम बम बनाने की कोशिश शुरू कर दी। 1965 में भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो पर कहा था कि अगर उन्हें इजाजत मिले, तो वो 18 महीने में एटम बम बना देंगे।
24 जनवरी 1966 को एक यात्री विमान हादसे में भाभा सहित प्लेन में सवार सभी 111 लोगों की मौत हो गई। CIA पर आरोप लगा कि उसने भारत का न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम रोकने के लिए भाभा की हत्या कराई।
18 मई 1974 को भारत ने प्लूटोनियम बम का सफल परमाणु परीक्षण किया। इसे भारत ने शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कहा था, लेकिन पूरी दुनिया में भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम की निंदा हुई। कनाडा ने न्यूक्लियर समझौता रद्द कर दिया। भारत पर कई प्रतिबंध लगाए गए।
इसके बाद भारत को परमाणु बम बनाने में दो दशक लग गए। 1996 में कॉम्प्रिहेंसिव टेस्ट बैन ट्रीटी (CTBT) पर साइन करने का दबाव डाला गया, लेकिन भारत ने मना कर दिया। दो साल बाद 11 और 13 मई 1998 को भारत ने पोकरण में 5 सफल परमाणु बम परीक्षण किए। इनमें से एक हाइड्रोजन बम भी था।

पोकरण में सफल परीक्षण के बाद तब के PM अटल बिहारी (आगे सबसे बाएं) के साथ रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और DRDO के तब के चीफ एपीजे अब्दुल कलाम एवं अन्य।
आठवें नंबर पर न्यूक्लियर वेपन बनाने वाला देश था- साउथ अफ्रीका। 1977 में साउथ अफ्रीका कालाहारी रेगिस्तान में न्यूक्लियर टेस्टिंग करने ही वाला था, तभी रूसी सैटेलाइट ने वहां एक्टिविटी देखी और अमेरिका को इसकी खबर दी। अंतरराष्ट्रीय दबाव में वहां काम रुक गया।
इसके बाद 1979 में अमेरिकी सैटेलाइट्स ने हिंद महासागर के प्रिंस एडवर्ड द्वीप पर एक साथ दो बड़ी रोशनियां देखीं। माना जाता है कि साउथ अफ्रीका ने इजराइल के साथ मिलकर दो न्यूक्लियर टेस्ट एक साथ किए थे। 1980 के दशक में इजराइल को यूरेनियम देकर बदले में उससे तकनीक लेकर साउथ अफ्रीका ने 6 और परमाणु बम बनाए।
सवाल-4: पाकिस्तान और नॉर्थ कोरिया ने चोरी की तकनीक से परमाणु बम कैसे बनाए?
जवाबः 1974 में भारत के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था- ‘अगर भारत बम बनाता है तो हम घास खा लेंगे, भूखे भी सो जाएंगे, लेकिन हमें बम बनाना होगा।’
अब्दुल कादिर खान 1972 से एम्सटर्डम की एक न्यूक्लियर फैसिलिटी में काम करते थे। उन्होंने ISI से संपर्क किया और 1975 में पाकिस्तान लौट आए। खान वहां से बम बनाने की तकनीक चुरा लाए थे। चीन ने भी पाकिस्तान को तकनीकी मदद की। 13 मई 1998 को भारत के न्यूक्लियर टेस्ट के जवाब में 28 मई को पाकिस्तान ने भी 5 न्यूक्लियर टेस्ट किए।
2004 में खान ने टीवी पर एक प्रोग्राम में कबूल किया कि वो ईरान, नॉर्थ कोरिया और लीबिया को न्यूक्लियर बम की तकनीक बेचने में शामिल थे।
वहीं, नॉर्थ कोरिया को 1959 में रूस से एक छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर मिला था। 1980 के दशक में नॉर्थ कोरिया ने बम बनाने पर काम शुरू किया। 1990 में उसे मिसाइल तकनीक के बदले में पाकिस्तान से न्यूक्लियर बम की टेक्नोलॉजी मिली। 9 अक्टूबर 2006 को नॉर्थ कोरिया ने पहला एटम बम बना लिया और 3 सितंबर 2017 को नॉर्थ कोरिया ने हाइड्रोजन बम की सफल टेस्टिंग का भी दावा किया।
इनके अलावा कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका ने करीब एक दर्जन देशों को न्यूक्लियर वेपन दिए थे। बेल्जियम, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और तुर्की से ये बम कभी वापस नहीं लिए गए। 2023 में रूस ने बेलारूस को 130 परमाणु बम दिए।

सवाल-5: क्या अब कोई नया देश परमाणु हथियार नहीं बना सकता?
जवाब: महज 100-200 परमाणु बम ही दुनिया तबाह कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल हुआ तो ‘न्यूक्लियर विंटर’ शुरू हो सकता है, यानी इतना धुआं और राख वातावरण में फैल जाएगी कि सूरज की रोशनी धरती तक नहीं पहुंचेगी।
इन्हीं खतरों की वजह से 1960 के बाद दुनिया भर के देशों को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कोशिशें शुरू हुईं। 1963 में पार्शियल टेस्ट बैन ट्रीटी (PTBT) पर अमेरिका, सोवियत और UK ने साइन किए थे, तय हुआ कि अंडरग्राउंड जगहों के अलावा कहीं भी टेस्टिंग नहीं होगी। हालांकि, टेस्टिंग नहीं रुकी।
1970 में लागू हुई नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी (NPT) को परमाणु हथियारों पर रोक के लिए सबसे प्रभावी संधि माना जाता है। इस पर 1967 से पहले परमाणु बम बना चुके 5 देश- अमेरिका, रूस, फ़्रांस, चीन और UK सहित कुल 191 देशों ने साइन किए हैं। इसके तहत ये 5 देश ही परमाणु हथियार रख सकते हैं, कोई नया देश परमाणु बम नहीं बना सकता।
हालांकि भारत, इजराइल और पाकिस्तान ने NPT पर कभी साइन ही नहीं किए थे। अकेले साउथ अफ्रीका ने 1991 में NPT में शामिल होने के बाद अपने बम नष्ट कर दिए थे।
सवाल-6: ईरान परमाणु हथियार बनाने से कितनी दूर है?
जवाब: ईरान के पास यूरेनियम की प्योरिटी बढ़ाने वाले दो न्यूक्लियर प्लांट हैं- नतांज और फोर्डो। कई प्रतिबंधों के बावजूद ईरान इनमें यूरेनियम संवर्धन कर रहा है। इजराइल, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों का दावा है कि ईरान ने 87% तक यूरेनियम शुद्ध कर लिया है। इससे आधा दर्जन परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। साथ ही ईरान अब ताकतवर परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी 90% प्योर यूरेनियम हासिल करने के काफी करीब है।
यूनाइटेड नेशन्स की वॉच डॉग मानी जाने वाली संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी, IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा था कि ये कोई सीक्रेट नहीं है कि ईरान के नेता परमाणु हथियार विकसित करना चाहते हैं। वह कुछ हफ्ते या महीने में परमाणु बम तैयार कर सकता है।
सवाल-7: क्या ईरान को परमाणु बम बनाने से रोक पाएंगे इजराइल-अमेरिका?
जवाब: ईरान के 3 प्रमुख न्यूक्लियर प्लांट हैं- नतांज, फोर्डो और इस्फहान। इनमें से नतांज में सबसे ज्यादा 16 हजार सेंट्रीफ्यूज मशीनें लगाकर यूरेनियम का संवर्धन किया जा रहा था।
IAEA ने UN में कहा है कि इजराइल के हमलों में नतांज प्लांट का ऊपरी हिस्सा नष्ट हो गया है। सेंट्रीफ्यूज मशीनों को भी नुकसान पहुंचा है। इजराइल ने ईरान के 9 न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स को भी मार दिया है।
हालांकि, ईरान ने इजराइल के हमले से ठीक पहले कहा था कि वह एक और न्यूक्लियर प्लांट शुरू करने वाला है। जनवरी 2025 में जब ट्रम्प ने ईरान को न्यूक्लियर डील करने या फिर युद्ध झेलने की धमकी दी थी, तब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास ने कहा था, ‘ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम किसी हमले से खत्म नहीं किया जा सकता। ये टेक्नोलॉजी हमने हासिल कर ली है और जो टेक्नोलॉजी दिमाग में मौजूद हो, उसे किसी बम से नष्ट नहीं किया जा सकता।’
अगर ईरान आगे भी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करता है, तो हमेशा की तरह इजराइल इसे किसी भी हद तक जाकर रोकेगा। वह इसके पहले भी ईरान के न्यूक्लियर प्लांट्स पर मिसाइल और साइबर अटैक कर चुका है।
इधर ट्रम्प लगातार ईरान पर न्यूक्लियर डील के लिए दबाव डाल रहे हैं, जबकि ईरान ने अब आगे किसी भी बातचीत से मना कर दिया है।

ईरानी न्यूक्लियर प्लांट में रखी सेंट्रीफ्यूज मशीनों की एक पुरानी तस्वीर।
सवाल-8: ईरान के परमाणु बम बनाने से इजराइल-अमेरिका को इतनी दिक्कत क्यों है?
जवाब: इसकी दो बड़ी वजहें हैं-
1. मिडिल-ईस्ट में पावर बैलेंस
- मिडिल-ईस्ट में इजराइल के अलावा किसी भी देश के पास परमाणु बम नहीं हैं। इजराइल-अमेरिका का मानना है कि ईरान ने परमाणु बम बना लिया तो मिडिल-ईस्ट में पावर बैलेंस बिगड़ जाएगा।
- ईरान और सऊदी अरब में इस्लामिक देशों की लीडरशिप को लेकर वर्चस्व की पुरानी लड़ाई है। सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कई बार कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु बम बनाता है तो हम भी बनाएंगे। इससे परमाणु बम बनाने की होड़ फिर शुरू हो जाएगी।
2. इजराइल और अमेरिका के लिए खतरा बढ़ेगा
- इजराइल का कहाना है कि ईरान ने उसे नेस्तनाबूद करने की कसम खाई है। अगर ईरान के पास परमाणु शक्ति आई, तो वो सबसे पहला इस्तेमाल इजराइल पर ही करेगा।
- इजराइल का आरोप है कि ईरान उसके खिलाफ हमास, हिजबुल्लाह और यमन के हूतियों को मदद देता है। ये सभी इजराइल और अमेरिका पर मिसाइल अटैक करते रहे हैं। कल्पना करिए, अगर इजराइल-हमास जंग के दौरान ईरान के पास न्यूक्लियर मिसाइल्स होतीं, तो इजराइल के लिए ये जंग लड़ना बेहद मुश्किल होता।
- एक वजह ये भी है कि ईरान ने 1968 में NPT पर साइन किए थे। इसके बावजूद वह परमाणु बम बनाना चाहता है। इसीलिए अमेरिका नए सिरे से ईरान के साथ एक समझौता करना चाहता है।